Bhartiya Chintan Paramparaye (HB)

160

ISBN:  978-81-7309-7
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Description

प्रस्तुत पुस्तक में अज्ञेय प्रवर्तित ‘हीरानंद-शास्त्री व्याख्यानमाला’ के दो महत्त्वपूर्ण व्याख्यान संकलित है। इन दोनों व्याख्यानों को भारत के शिखर दार्शनिक दयाकृष्ण जी, निर्मल वर्मा तथा पंडित विद्यानिवास मिश्र की अध्यक्षता में देते हैं। दोनों व्याख्यानों का विषय बहुत ही चुनौतीपूर्ण है* भारतीय चिंतन परंपराएँ। भारतीय चिंतन परंपराएँ एक या दो या तीन की गिनती में गिनी नहीं जा सकती। क्योंकि भारतीय चिंतन परंपराएँ अनेक हैं जिनमें भारतीयता तथा सनातनता के अनेक आयामों पर गहन चिंतन किया गया है। हमारी चिंतन परंपराओं की विशेषता है कि उनमें निरंतर बहस, संदेह तथा तर्क हैं। इन बहसों से नई विचार सूझते हैं। दूसरे, हमारी चिंतन परंपराएँ रूढ़ि और मौलिकता दोनों से गहन चिंतन के स्तर पर जूझती हैंताकि परंपरा बंधन न बने। वह हमें मुक्ति की ओर, चिंतन की स्वाधीनता की ओर निरंतर ले जाकर सत्यान्वेषण के लिए प्रेरित करती रहे।

अज्ञेय ने अपने चिंतन क्रम में परंपरा तथा आधुनिकता पर न जाने कितने कोणों से विचार किया है। हिंदी में पहली बार परंपरा को चिंतन के केंद्र में अज्ञेय ही लाएँ और नई बहसों को जन्म दिया। ‘सप्तकों’ की भूमिकाओं में विशेषकर दूसरा सप्तक’ 1951 की भूमिका में कहा कि जो लोग प्रयोग की निंदा करने के लिए परंपरा की दुहाई देते हैं, वे यह भूल जाते हैं कि परंपरा, कम-से-कम कवि के लिए, कोई ऐसी पोटली बाँधकर अलग रखी हुई चीज नहीं है जिसे वह उठाकर सिर पर लाद ले और चल निकले।

Additional information

Weight 300 g
Dimensions 14.2 × 22.1 × 1.1 cm

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