Ramayankaleen Samaj/रामायणकालीन समाज-शांतिकुमार नानूराम व्यास 300/-
RS:
₹300
Author: SHANTIKUMAR NANURAM VYAS
ISBN: 978-81-7309-705-8
Pages: 344
Edition: 1ST
Language: HINDI
Year: 2018
Binding: Paper Cover
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Book Description
रामायणकालीन समाज
हमारे प्राचीन साहित्य के दो अत्यंत लोकप्रिय ग्रंथ महाभारत और रामायण हैं। देश का शायद ही कोई ऐसा सुशिक्षित परिवार होगा, जिसने इन दोनों ग्रंथों का नाम न सुना हो तथा इनकी कहानी न पढ़ी हो, यहाँ तक कि अशिक्षित व्यक्तियों के घरों में भी इनका नाम पहुँचा है। इन दोनों ग्रंथों में रामायण को विशेष लोकप्रियता प्राप्त है।
हिंदी-जगत् दो रामायणों से परिचित है-एक वाल्मीकि-कृत, जो संस्कृत में है, दूसरी गोस्वामी तुलसीदास-कृत, जो अवधी में है। दोनों के चरित–नायक एक हैं, पर उनके विवरणों में जहाँ-तहाँ अंतर है।
संस्कृत में होने के कारण वाल्मीकि रामायण से कम ही लोग परिचित हैं। उसकी भाषा, शैली तथा घटनाएँ बड़ी ही सजीव हैं। ज्ञान की तो वह खान है। उसमें जितना गहरा प्रवेश किया जाता है, उतने ही मूल्यवान् रत्न प्राप्त होते हैं।
हमें हर्ष है कि लेखक ने वाल्मीकि रामायण का बड़ी बारीकी से अध्ययन करके उस युग की सामाजिक और सांस्कृतिक परिस्थितियों की विशद जानकारी पाठकों को दो पुस्तकों में दी है। इस पुस्तक में उन्होंने उन विषयों को लिया है, जो तत्कालीन सामाजिक, आर्थिक एवं प्रशासनिक परिस्थितियों से संबंधित हैं। हमें विश्वास है कि रामायण की कथा से सुपरिचित पाठक के लिए भी यह विवेचन नवीन और रोचक सिद्ध होगा, और उन्हें यह अनुभव होगा कि रामायण हमारे सामाजिक एवं राजनीतिक इतिहास का एक महत्त्वपूर्ण अध्याय है।
इस पुस्तक की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसकी उपयोगिता विद्वत वर्ग तक ही सीमित नहीं है, अपितु इससे सामान्य पाठक भी लाभ उठा सकते हैं, कारण कि इसमें दुर्बोध अथवा शुष्क सैद्धांतिक सामग्री का समावेश न करके लेखक ने जीवन के स्पंदनशील कणों को एकत्र किया है।
पुस्तक का यह नवीन संस्करण है। लेखक ने भाषा आदि को अच्छी तरह परिमार्जित कर दिया है।
विश्वास है कि यह पुस्तक वाल्मीकि रामायण को समझने तथा उसे लोकप्रिय बनाने में सहायक होगी और पहले संस्करण की भाँति इसका भी सर्वत्र स्वागत होगा।

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