Trishanku Ek Vigyan Katha/त्रिशंकु एक विज्ञान कथा PB Rs. 400/- HB Rs. 750/-
Rated 5.00 out of 5 based on 2 customer ratings
(2 customer reviews)
RS:
₹400 – ₹750Price range: ₹400 through ₹750
390
People watching this product now!
Author Name : Arvind Dubey
Language : Hindi
ISBN : (PB) 9789348765765 (HB) 9789348765789
Page : 248
Fully
Insured
Ships
Nationwide
Over 4 Million
Customers
100%
Indian Made
Century in
Business
Book Description
त्रिशंकु एक विज्ञान कथा
Related Books to this Category...
You May Be Interested In…
Customer Reviews
5
Rated 5 out of 5
2 reviews
Rated 5 out of 5
2
Rated 4 out of 5
0
Rated 3 out of 5
0
Rated 2 out of 5
0
Rated 1 out of 5
0
2 reviews for Trishanku Ek Vigyan Katha/त्रिशंकु एक विज्ञान कथा PB Rs. 400/- HB Rs. 750/-
Clear filters
Add a review Cancel reply

Arvind Dubey –
‘त्रिशंकु’ शब्द का प्रयोग बीच में लटके व्यक्ति या स्थिति के लिए किया जाता है। बाल्मीकि रामायण के बालकांड में कथा है कि श्री राम के ‘इक्ष्वाकु वंश’ के राजा पृथु के पुत्र सत्यव्रत की इच्छा, प्राकृतिक नियमों के विरुद्ध, सशरीर स्वर्ग में प्रवेश करने की थी। इसके लिए वह ऋषि वशिष्ठ के पास गए पर महर्षि वशिष्ठ ने ऐसा करने से मना कर दिया। तब उन्होंने महर्षि वशिष्ठ के ज्येष्ठ पुत्र हर्ष से अपनी इच्छापूर्ति हेतु निवेदन किया। जब हर्ष को ज्ञात हुआ कि उनके पिता राजा सत्यवान का निवेदन पहले ही ठुकरा चुके हैं। सत्यवान धोखे से उनसे यह कार्य कराना चाहते हैं तो उन्होंने उन्हें श्राप दिया जिसके फलस्वरुप राजा का शरीर काला हो गया। वह जंगलों में भटकने लगे। यहीं उनकी भेंट ऋषि विश्वामित्र से हुयी। उन्होंने उन्हें अपनी इच्छा बताई, महर्षि वशिष्ठ के व उनके पुत्र द्वारा उन्हें मना करने व श्राप देने का वृतांत सुनाया और प्रलोभन दिया। ऋषि विश्वामित्र, महर्षि वशिष्ठ से मनोमालिन्य रखते थे। अत: उन्होने अपनी सात्विक शक्तियों का दुरुपयोग करते हुये सत्यवृत को सशरीर स्वर्ग भेज दिया। यह प्राकृतिक नियमों के विरुद्ध था। स्वर्ग के अधिपति इंद्र ने उन्हें वापस कर दिया। वे नीचे मुंह किए तेजी से पृथ्वी की ओर गिरने लगे। यह देखकर विश्वामित्र को बहुत क्रोध आया। उन्होंने पृथ्वी की ओर गिरते सत्यव्रत को बीच में स्थिर कर दिया और कहा कि यदि इंद्र ने तुम्हें स्वर्ग में प्रवेश देने से मना कर दिया है तो मैं तुम्हारे लिए दूसरे स्वर्ग की रचना करता हूं। विश्वामित्र का यह स्वर्ग नैसर्गिक स्वर्ग के लिए एक चुनौती होता। देवताओं ने विश्वामित्र से प्रार्थना की कि वह दूसरे स्वर्ग की रचना न करें। वह देवताओं की प्रार्थना मान गए पर वह सत्यव्रत को पृथ्वी से भेज चुके थे। अब उन्हें पृथ्वी की पर लाना संभव न था। कथा है कि तब से त्रिशंकु सत्यव्रत नक्षत्रों के बीच मुंह नीचे किये लटके हैं।
मुझे यह संपूर्ण विज्ञान कथा लगती है । हो सकता है विशेषज्ञ इसमें वैज्ञानिक तथ्यों की कमी या अनुपस्थिति का हवाला देते हुये मुझसे सहमत न हों। किसी विज्ञान कथा में वर्णित वैज्ञानिक तथ्यों का आकलन उस देश-काल में ज्ञात वैज्ञानिक तथ्यों के आधार पर होना चाहिए, न कि आज के वैज्ञानिक ज्ञान के आधार पर। तपती रेत में चलने के लिए आदिपुरुष द्वारा पैरों में पेड़ के पत्ते बांधना उस काल का सफल वैज्ञानिक प्रयोग और वैज्ञानिक ज्ञान का चरमोत्कर्ष रहा होगा। तब इस घटना को आधार बनाकर कोई कथा लिखी गयी हो तो उसे एक आदर्श विज्ञान कथा माना जाना चाहिए। भले ही आज के हिसाब से उसमें कोई वैज्ञानिक तथ्य दिखाई नहीं देता हो।
त्रिशंकु की कथा के लेखन काल तक नाभिकीय फ्यूजन, लेसर, जीवाणु, वर्महोल, डार्क मैटर, नैनो टेक्नोलॉजी जैसे तथ्यों की जानकारी नहीं रही होगी। उस समय की सबसे बड़ी शक्ति मानसिक शक्ति थी। उस समय के कथाकारों ने अपने वृत्तांतों में असंभव कार्यों के कार्यान्वन के लिए मानसिक शक्ति का सहारा लिया क्योंकि तब यह शक्ति निस्सीम थी, इसकी क्षमता कल्पनातीत थी। वे इसका सहारा लेकर किसी असंभव कार्य को संभव या संभाव्य होने का विश्वास अपने पाठक को करा सकते थे। मंत्र, श्राप, तपशक्ति मानसिक शक्ति के ही आयाम थे जिन्हें तत्कालीन कथा-शिल्पियों ने अपनी कल्पना-कथाओं (फंतासियों) में प्रयोग किया।
आज के वैज्ञानिक परिवेश में यह घटना किस प्रकार घटती? स्वर्ग पृथ्वी से दूर, अंतरिक्ष में ऐसे आवासीय स्थान की कल्पना रही होगी जहां वातावरण और शुद्ध और स्वास्थ्य वर्धक होगा, जहां पृथ्वी के मानसिक, शारीरिक और सामाजिक कष्ट नहीं होंगे। विश्वामित्र ने किसी जुगत से सत्यवृत को स्वर्ग भेजने की व्यवस्था कर दी। विश्वामित्र को अपने प्रयोग की सफलता पर इतना विश्वास था कि उन्होंने सत्यव्रत के लिए एकतरफा परिवहन की व्यवस्था ही की, नहीं तो स्वर्ग से ठुकराये जाने के बाद सत्यव्रत पृथ्वी पर वापस लौट आते। उस काल के कथाशिल्पी को यह ज्ञात नहीं था कि अंतरिक्ष में पृथ्वी की तरह किसी भी स्थान पर सीधी रेखा में चलकर नहीं पहुंचा जा सकता है। अत: उन्होंने गिरते समय सत्यव्रत के अधर में लटकने की कल्पना की जहां नक्षत्रों कर बीच स्थिर होकर वह पृथ्वी का चक्कर लगाने लगे। हो सकता है यह पृथ्वी की उस कक्षा का विवरण हो, जिसे हम ‘भूस्थिर कक्षा’ कहते हैं।
त्रिशंकु की कथा एक नीति कथा भी है जिसमें अहंकारी राजा सत्यव्रत योग्यता न होने पर भी अपने प्रभुत्व और भौतिक संपदा के बल पर प्रकृति के नियमों की अनदेखी कर स्वर्ग जाने पर उतारू है। वह यह मानता है कि धन से सब कुछ खरीदा जा सकता है। लोक कल्याण के लिए राजा के प्रलोभन को ठुकराने वाले महर्षि वशिष्ठ हैं तो दूसरी ओर अहंकारी व बदला लेने की भावना में अंधे होकर लोक कल्याण को विस्मृत करने वाले ऋषि विश्वामित्र हैं जो राजा को स्वर्ग पहुंचाने के लिए सात्विक शक्तियों का दुरुपयोग करते हैं। अंतत: सत्य की जीत होती है। अहंकारी राजा अपने पद और संपदा के दुरुपयोग का दुष्परिणाम भोगता है। कहानी संदेश देती है कि दुनिया में धन ही सब कुछ नहीं है। कुछ पाने के लिए व्यक्ति में योग्यता होनी चाहिए। धन तभी उसकी सहायता कर सकता है।
प्रस्तुत उपन्यास में भी एक स्वर्ग है पर यह पौराणिक कथाओं का वाला स्वर्ग नहीं, वरन लैंग्रेज बिंदु-पांच पर बनी नियंत्रित वातावरण वाली अंतरिक्ष कॉलोनी है जहां सब कुछ अच्छा है और जो ज्ञात वैज्ञानिक तथ्यों के आधार पर संभाव्य है। अहंकारी बिनानियो मानता है कि धन से सब कुछ खरीदा जा सकता है, ईमानदारी पर प्राण देने वाला हैरिस है, जन कल्याण को विस्मृत कर हजारों लोगों की जिंदगी को दांव पर लगाने वाला स्मिथ है।
यह कथा त्रिशंकु की पौराणिक कथा का पुनर्लेखन नहीं है, यहां तक कि शीर्षक के अतिरिक्त इसमें त्रिशंकु शब्द भी कहीं नहीं आया है। पर इतना निश्चित है कि उपन्यास पढ़ने के बाद आपको त्रिशंकु की याद अवश्य आएगी। तब इस उपन्यास के त्रिशंकु की कथा क्या है? यह तो आप इसे पढ़ने के बाद ही जान पायेंगे।
अरविन्द दुबे –
रामायण के बालकांड में वर्णित रघुकुल के राजा सत्यव्रत की कथा के बारे में अधिकांश लोग जानते हैं कि वे सत्ता, धन और प्रभुत्व के बल पर सशरीर जाना चाहते थे। महर्षि वशिष्ठ के मना करने पर उन्होंने विश्वामित्र की शरण ली जिन्होंने अपनी सात्विक शक्तियों दुरुपयोग करते हुए उन्हें सा शरीर स्वर्ग भेजा लेकिन वह वहां जाने के पात्र नहीं थे अतः उन्हें वापस पृथ्वी पर भेज दिया गया। पर वे पृथ्वी पर लौट नहीं सके और अंतरिक्ष में उल्टा लटके हुए नक्षत्रों के चक्कर लगा रहे हैं।
यह एक नीति विज्ञान कथा भी है । इसमें मेरे लिए एक प्रभुतासंपन्न व्यक्ति सोचता है कि धन और सत्ता के बल पर कुछ भी प्राप्त किया जा सकता है। लोक कल्याण हेतु महर्षि वशिष्ठ किसी भी प्रलोभन को ठुकरा सकते हैं पर अवसरवादी महर्षि विश्वामित्र निहित स्वार्थ के लिए अपनी सात्विक शक्तियों का दुरुपयोग करने से हिचकते नहीं है। पर अंततः मिलता है उसे ही जो उसके योग्य होता है। धन और प्रभुत्व धरे के धरे रह जाते हैं और अनाधिकार चेष्टा बाद में बड़े कष्ट और पश्चाताप का कारण बनती है। इस कहानी में न सत्यव्रत हैं न विश्वामित्र हैं न वशिष्ठ हैं, फिर भी इसमें एक स्वर्ग है जो लाग्रेंज पॉइंट पांच पर स्थित है। राजा सत्यव्रत की तरह ही वहां रहने की इच्छा रखने वाला एक अयोग्य धनकुबेर विनानियो डी रिवेरा है। आगे की कथा आप पुस्तक में पढ़िए। अगर सब कुछ यहीं बता दूँगा तो पुस्तक पढ़ने का रोमांच जाता रहेगा। पुस्तक में शीर्षक के अतिरिक्त त्रिशंकु शब्द कहीं भी नहीं आया है।
हिंदी विज्ञान कथा में उपन्यासों की बेहद कमी है। उपन्यास ही क्या आजकल तो नई विज्ञान कथाओं का अकाल है। एक बार फिर हिंदी विज्ञान कथा अघोषित आपातकाल से गुजर रही है। यदि ऐसा ही रहा तो मुझे डर है की हिंदी विज्ञान कथा इतिहास की वस्तु न हो जाए। हिंदी में जो विज्ञान कथाएं लिखी भी जा रही हैं, मुझे यह कहने में कोई संकोच नहीं है एक उनका स्तर निरंतर गिरता चला जा रहा है। मेरा मानना है कि हिंदी में विज्ञान कथा का स्तर कम से कम उतना तो होना ही चाहिए जितना इस विज्ञान कथा उपन्यास का है बाकी अपेक्षा तो इससे बहुत बेहतर लिखे जाने की है।